मन किसी भी सीमा को कहीं भी स्वीकार कर सकता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि स्वभावत: अस्तित्व की कोई सीमा नहीं है, क्योंकि सीमा के पार क्या हो सकता है? फिर से एक और आकाश?
इसलिए मैं कह रहा हूं आसमान पर आसमान तुम्हारी उड़ान के लिए उपलब्ध हैं। आसानी से संतुष्ट मत होओ। जो आसानी से संतुष्ट होते हैं वे छोटे रह जाते हैं: उनकी छोटी सी खुशियां हैं, उनके छोटी सी मस्तियां हैं, छोटी सी उनकी खामोशियां हैं, उनका अंतरतम भी छोटा है। लेकिन इसकी कोई ज़रूरत नहीं है! यह छोटापन तुम्हारी स्वतंत्रता पर , तुम्हारी असीमित संभावनाओं पर, तुम्हारी असीमित क्षमता पर तुमने ही थोपा हुआ है ।
इसलिए मैं कह रहा हूं आसमान पर आसमान तुम्हारी उड़ान के लिए उपलब्ध हैं। आसानी से संतुष्ट मत होओ। जो आसानी से संतुष्ट होते हैं वे छोटे रह जाते हैं: उनकी छोटी सी खुशियां हैं, उनके छोटी सी मस्तियां हैं, छोटी सी उनकी खामोशियां हैं, उनका अंतरतम भी छोटा है। लेकिन इसकी कोई ज़रूरत नहीं है! यह छोटापन तुम्हारी स्वतंत्रता पर , तुम्हारी असीमित संभावनाओं पर, तुम्हारी असीमित क्षमता पर तुमने ही थोपा हुआ है ।
Osho लाइव जेन अध्याय 2
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