SUB KUCHH TO VAASTU NIYAMO SE KARNA CHAHIE THA
HUA KYA? SUB KUCHH TO BAN KAR TEYAAR HO GAYA.
KUCHH PARESHAANIYAAN HAEN ?
KYA PURANA GHAR TOD KAR BANAAENGE?
KIRAAE PAR REHTE HAEN?
KAHAAN DHOOND RAHE HAEN VAASTU KE ADHAAR PARR
BANA AASHIYANA.
AGAR SUB NAZAR AA BHI GAYA TO US KA MALIK DEGA HI KYOON KIRAAE PAR
WO TO SUKHI HI HAE YAANI WO GHAR BHI KAHEEN VAASTU DOSH MAEN HI HOGA?
PHIR KYA KAREN?
AAO KAREAN PRATHNA PRABHU CHARNO MAEN EK BAAR DIL AUR AASTHA SE
KESE>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>.
????????????????????????????
AAO KAREAN VICHAAR
Tuesday, August 24, 2010
कबाड़
KYOON KARTE HAEN MOH
APNE KBAAD SE
KAB KAAM AAEGA WO SAB
TOOTA PURANA FURNITURE
AUR SAALOON PURANE KAPDE
HATAAO SUB ....AUR
PAO KHUSHIYAAN
APNE KBAAD SE
KAB KAAM AAEGA WO SAB
TOOTA PURANA FURNITURE
AUR SAALOON PURANE KAPDE
HATAAO SUB ....AUR
PAO KHUSHIYAAN
पूजा केसे करें?
aaj ki mehgaai ke ander kese karen
pooja?
asaan hae.
Aap jo bhi chahte haen prabhu ke charno maen arpit karna
karo arpit MAANSIK POOJA SE.
pooja?
asaan hae.
Aap jo bhi chahte haen prabhu ke charno maen arpit karna
karo arpit MAANSIK POOJA SE.
गाए का घी
kahaan se milega poojan ke liea
shudh ghe
kya aap tv news dekhte haen?
to kya karen?
Til ka tel hi achha hoga.
shudh ghe
kya aap tv news dekhte haen?
to kya karen?
Til ka tel hi achha hoga.
धन prapti
maa lakshmi ji ke paas prati din ek deepak jlaaen aur
prathna kare dhan prapti ke lie samey 6:00pm
prathna kare dhan prapti ke lie samey 6:00pm
धन प्राप्ति केसे हो
chawal til aur khir se karo hawan vishesh dhan prapti mantroon ke saath
ichha avashy poori hogi.
ichha avashy poori hogi.
Thursday, August 12, 2010
मंत्र-जप
मंत्र-जप का चमत्कारी प्रभाव
जिस शब्द में बीजाक्षर है, उसी को `मंत्र´ कहते है।
किसी मंत्र का बार-बार उच्चारण करना ही `मंत्र जप´ कहलाता है।
लेकिन प्रश्न यह उठता है कि वास्तव में मंत्र जप क्या है?
जप से क्या परिणाम निकलता है?
हमारे मन को दो भागों में बांटा जा सकता है- १. व्यक्त चेतना तथा २. अव्यक्त चेतना ।
हमारा जो जाग्रत मन है, उसी को व्यक्त चेतना कहते हैं।
अव्यक्त चेतना में हमारी अतृप्त इच्छाएँ, गुप्त भावनाएँ इत्यादि विद्यमान हैं।
व्यक्त चेतना की अपेक्षा अव्यक्त चेतना अत्यन्त शक्तिशाली हैं।
हमारे संस्कार, वासनाएँ - यह सब अव्यक्त चेतना में ही स्थित होते हैं।
किसी मंत्र का जब जप होता है, तब अव्यक्त चेतना पर उसका प्रभाव पड़ता है।
मंत्र में एक लय होती है, उस मंत्र ध्वनि का प्रभाव अव्यक्त चेतना को स्पन्दित करता है।
मंत्र जप से मस्तिष्क की सभी नसों में चैतन्यता का प्रादुर्भाव होने लगता है और मन की चंचलता कम होने लगती है। मंत्र जप के माध्यम से दो तरह के प्रभाव उत्पन्न होते हैं।
१. मनोवैज्ञानिक प्रभाव और
२. ध्वनि प्रभाव
- मनोवैज्ञानिक प्रभाव तथा ध्वनि प्रभाव के समन्वय से एकाग्रता बढ़ती है और एकाग्रता बढ़ते से इष्ट सिद्धि का फल मिलता ही है।
मंत्र जप का मतलब है इच्छा शक्ति को तीव्र बनाना। इच्छा शक्ति की तीव्रता से क्रिया-शक्ति भी तीव्र बन जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप इष्ट का दर्शन या मनोवांछित फल प्राप्त होता ही है।
मंत्र अचूक होते हैं तथा शीघ्र फलदायक भी होते है।
मंत्र जप और स्वास्थ्य
लगातार मंत्र जप करने से उच्च रक्तचाप, ग़लत धारणाएँ, गंदे विचार आदि समाप्त हो जाते हैं।
मंत्र जप का साइड इफेक्ट यही है। मंत्र में विद्यमान हर एक बीजाक्षर शरीर की नसों को उद्दीप्त करता है, इससे शरीर में रक्त संचार सही ढंग से गतिशील रहता है।
`क्लीं´, `ह्रीं´ इत्यादि बीजाक्षरों को एक लयात्मक पद्धति से उच्चारण करने पर हृदय तथा फेफड़ों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है व उनके विकार नष्ट होते हैं।
जप के लिए ब्रहा मुहूर्त को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उस समय परा वातावरण शान्ति पूर्ण होता रहता है, किसी भी प्रकार का कोलाहल या शोर नहीं होता।
कुछ विशिष्ठ साधनाओं के लिए रात्रि का समय अत्यन्त प्रशस्त होता है।
गुरू के निर्देशानुसार निर्दिष्ट समय में ही साधक को जप करना चाहिए।
सही समय पर सही ढंग से किया हुआ जप अवश्य ही फलप्रद होता है।
मंत्र जप करने वाले साधक के चेहरे पर एक अपूर्व तेज छलकने लगता है, चेहरे पर एक अपूर्व आभा आ जाती है। आयुर्वेद की दृष्टि से देखा जाय, तो जब शरीर शुद्ध और स्वस्थ होगा, शरीर स्थित सभी संस्थान सुचारू रूप से कार्य करेंगें, तो इसके परिणाम स्वरूप मुखमण्डल में नवीन कांति का प्रादुर्भाव होगा ही।
sanklan>>>>>>>>>>>
VAASTU ACHARYA
0 9013289566
0 9013203040
जिस शब्द में बीजाक्षर है, उसी को `मंत्र´ कहते है।
किसी मंत्र का बार-बार उच्चारण करना ही `मंत्र जप´ कहलाता है।
लेकिन प्रश्न यह उठता है कि वास्तव में मंत्र जप क्या है?
जप से क्या परिणाम निकलता है?
हमारे मन को दो भागों में बांटा जा सकता है- १. व्यक्त चेतना तथा २. अव्यक्त चेतना ।
हमारा जो जाग्रत मन है, उसी को व्यक्त चेतना कहते हैं।
अव्यक्त चेतना में हमारी अतृप्त इच्छाएँ, गुप्त भावनाएँ इत्यादि विद्यमान हैं।
व्यक्त चेतना की अपेक्षा अव्यक्त चेतना अत्यन्त शक्तिशाली हैं।
हमारे संस्कार, वासनाएँ - यह सब अव्यक्त चेतना में ही स्थित होते हैं।
किसी मंत्र का जब जप होता है, तब अव्यक्त चेतना पर उसका प्रभाव पड़ता है।
मंत्र में एक लय होती है, उस मंत्र ध्वनि का प्रभाव अव्यक्त चेतना को स्पन्दित करता है।
मंत्र जप से मस्तिष्क की सभी नसों में चैतन्यता का प्रादुर्भाव होने लगता है और मन की चंचलता कम होने लगती है। मंत्र जप के माध्यम से दो तरह के प्रभाव उत्पन्न होते हैं।
१. मनोवैज्ञानिक प्रभाव और
२. ध्वनि प्रभाव
- मनोवैज्ञानिक प्रभाव तथा ध्वनि प्रभाव के समन्वय से एकाग्रता बढ़ती है और एकाग्रता बढ़ते से इष्ट सिद्धि का फल मिलता ही है।
मंत्र जप का मतलब है इच्छा शक्ति को तीव्र बनाना। इच्छा शक्ति की तीव्रता से क्रिया-शक्ति भी तीव्र बन जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप इष्ट का दर्शन या मनोवांछित फल प्राप्त होता ही है।
मंत्र अचूक होते हैं तथा शीघ्र फलदायक भी होते है।
मंत्र जप और स्वास्थ्य
लगातार मंत्र जप करने से उच्च रक्तचाप, ग़लत धारणाएँ, गंदे विचार आदि समाप्त हो जाते हैं।
मंत्र जप का साइड इफेक्ट यही है। मंत्र में विद्यमान हर एक बीजाक्षर शरीर की नसों को उद्दीप्त करता है, इससे शरीर में रक्त संचार सही ढंग से गतिशील रहता है।
`क्लीं´, `ह्रीं´ इत्यादि बीजाक्षरों को एक लयात्मक पद्धति से उच्चारण करने पर हृदय तथा फेफड़ों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है व उनके विकार नष्ट होते हैं।
जप के लिए ब्रहा मुहूर्त को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उस समय परा वातावरण शान्ति पूर्ण होता रहता है, किसी भी प्रकार का कोलाहल या शोर नहीं होता।
कुछ विशिष्ठ साधनाओं के लिए रात्रि का समय अत्यन्त प्रशस्त होता है।
गुरू के निर्देशानुसार निर्दिष्ट समय में ही साधक को जप करना चाहिए।
सही समय पर सही ढंग से किया हुआ जप अवश्य ही फलप्रद होता है।
मंत्र जप करने वाले साधक के चेहरे पर एक अपूर्व तेज छलकने लगता है, चेहरे पर एक अपूर्व आभा आ जाती है। आयुर्वेद की दृष्टि से देखा जाय, तो जब शरीर शुद्ध और स्वस्थ होगा, शरीर स्थित सभी संस्थान सुचारू रूप से कार्य करेंगें, तो इसके परिणाम स्वरूप मुखमण्डल में नवीन कांति का प्रादुर्भाव होगा ही।
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दीपावली पर धन-प्राप्ति के चमत्कारी प्रयोग
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पं0 दयानन्द शास्त्री
दीपावली के दिन घनी काली अंधेरी रात होती है। काली अंधेरी रात या कोई भी अंधकार कष्ट का प्रतीक माना गया है, क्योंकि अंधकार में मार्ग दिखाई नहीं देता, व्यक्ति रास्ता भटक जाता है। मन में जब तक दुख: का, ग़म का अंधेरा रहेगा, तब तक व्यक्ति सफलता नहीं पा सकेगा। अंधेरे से उजाले की ओर जाने की प्रक्रिया को ही अमावस्या शांति कहते हैं। जितनी अधिक काली अंधेरी रात होती है, वह इस बात की प्रतीक है कि अब आगे जल्दी रोशनी का पहर आने वाला है। जैसे-जैसे सुबह नज़दीक आती है, अंधेरा और बढ़ता जाता हैं। जैसे-जैसे सुबह की किरण फूटने वाली होती है, व्यक्ति दुनिया की सुध-बुध भूलकर चैन से सोना चाहता है। सुबह का आना इस बात का प्रमाण है कि कोई भी अंधेरा अधिक समय तक नहीं टिकता। अधिक ग़म, अधिक ख़ुशी अधिक समय तक नहीं टिकती। अत्यधिक ग़म इस बात का संकेत हैं कि अब जल्दी ही ख़ुशी मिलने वाली है, अत्यधिक नींद इस बात का संकेत हैं कि सपनों की दुनिया के आगे वास्तविक उपलब्धि हाथ से जाने वाली है। कहा भी गया हैं कि ’जो सोवत हैं वो खोवत है, जो जागत है वो पावत है’ अर्थात ब्रह्म मुहूर्त के बाद सोना ज़िंदगी में बहुत कुछ खो देने का संकेत कहा गया है।
दीपावली की अमावस्या के दिन लकड़ी की दो चौकी लें। जिस दिन दीपावली की अमावस्या पड़े, उस दिन उस समयावधि से पहले सरसों के तेल का एक बड़ा दिया जला देवें और शनिदेव की तस्वीर, प्रतिमा या मंत्र के आगे तेल का दिया रखकर यह प्रार्थना करें कि हमारे घर में लक्ष्मी के आगमन में, सफलता में जो भी विघ्न, बाधा, परेशानी, रुकावट आ रही हैं, वे दूर हो जायें और उस दिये को अखण्ड जलने दें। दूसरे दिन के दीपावली पूजन हो जाने तक उसे जलाना चाहिए। जब दीपावली पूजन का मुहूर्त हो, उस समय लकड़ी की एक चौकी पर महालक्ष्मी माता की तस्वीर रखें और दूसरी चौकी पर शनि देव की तस्वीर, काला वस्त्र चौकी पर बिछाकर रखें। लक्ष्मी जी वाली चौकी पर रक्त लाल रंग का वस्त्र बिछायें। लक्ष्मी जी की हल्दी, कुमकुम, अष्टगंध, मिष्ठान, खील-बताशे, पकवान व खीर-पूड़ी अर्पण कर विधिवत पूजन करें। उन्हें लाल पुष्प व लाल वस्त्र अर्पण करें। शनिदेव को काले अक्षत, नीले पुष्प से पूजन करके, उड़द व तिल से बने पकवान भोग में अर्पण करें। जब भोग लगायें, तब जल भी साथ में रखें। एक-एक सूखा नारियल और एक-एक पानी वाला नारियल दोनों चौकी पर रखें। सामने बैठकर एक माला शनि महामंत्र की और एक माला महालक्ष्मी मंत्र की जाप करें। मंत्र जाप प्रत्येक सदस्य भी अपने-अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए व जीवन में वैभव की प्राप्ति के लिए कर सकता है। जो मंत्र जाप करने हैं, वे निम्न हैं :
शनि महामंत्र
ऊँ नीलांजन समाभासं रवि पुत्रं यमाग्रजम्।
छाया मार्तण्ड सम्भूतं तम् नमामि शनैश्चरम्।।
महालक्ष्मी मंत्र
ऊँ श्रीं ह्यीं कमले कमलालये प्रसीद श्रीं ह्यीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मये नम:।
इन दोनों मंत्रों के जाप के पूर्व अपने गुरू का व गणपति जी का मंत्र भी ११-११ बार पाठ कर लें। मंत्र पाठ के बाद आरती करें, कपूर जलायें। फिर जो भी प्रसाद शनिदेव के आगे रखा है और जो भी लक्ष्मी जी के आगे रखा हो, वो सभी अलग-अलग कपड़े में बाँध दें। शनिदेव के काले वस्त्र की चौकी पर उड़द, तिल, गुड़ के जो भी पकवान उड़द, तिल, गुड़ के साथ रखे थे, उन्हें काले कपड़े में बांध दें और लक्ष्मी जी वाला सारा सामान लाल कपड़े में बांध दें। मगर दोनों चौकी से पानी वाला नारियल अलग निकाल कर सामान को बांधना हैं। काले कपड़े वाला सामान किसी ग़रीब को या भिखारी को उसी रात्रि में दे दें। साथ में एक भोजन का बड़ा पेकेट भी उसे भोजन करने के लिए दें। लाल कपड़े वाला सामान किसी भी मंदिर के पुरोहित को दे दें। पानी वाले नारियल जो अलग निकाले थे, दोनों अपने घर के दरवाज़े पर यह कहकर फोड़ें कि मेरी ज़िन्दगी में धन प्राप्ति में, सफलता प्राप्ति में जो भी बाधा आ रही हैं उसे दूर करने के लिए हम यह श्रीफल बलि दे रहे हैं। नारियल फोड़ने के बाद उसके दोनों टुकड़ों में शक्कर में थोड़ा-सा दो चम्मच घी मिलाकर भर देवें। शक्कर से भरे यह नारियल अपने घर के अंदर या बाहर पीपल के बड़े पेड़ के नीचे ऐसी जगह पर अलग-अलग रखें, जहाँ पर खूब चीटिंया लगनी चाहिए। इस प्रकार से शनिदेव का प्रकोप इस दिन शांत होता हैं और महालक्ष्मी जी शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं। यदि घर में या घर के आस-पास कोई विधवा महिला हो तो दीपावली वाले दिन उसे भोजन, उपहार, वस्त्र आदि श्रद्धा से अवश्य देना चाहिए। ऐसा करने से सुहाग अमर होता है और परिवार में सुख बढ़ता है।
दूसरा उपाय यह हैं कि शनि मंत्र का और श्री यंत्र का अभिषेक पंचामृत से करें। फिर शुद्ध जल में धोकर व पोंछकर, अष्टगंध, केशर, चंदन से यंत्रों को लेपित करें। पुष्प, धूप, दीप, अगरबत्ती से आरती करके प्रसाद, मिष्ठान का अर्पण करें। दोनों यंत्रों के आगे अलग-अलग थाली में एक व्यक्ति की खुराक के बराबर भोजन सजाकर रखें। रात्रि भर भोजन रखा रहने दें। दूसरे दिन वह भोजन श्रद्धा से गाय को खिलाकर आयें।
तीसरा उपाय यह हैं कि दीपावली के दिन शनिदेव की प्रसन्नता व लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्ति हेतु महालक्ष्मी पूजन के मुहूर्त में हवन ज़रूर करें। हवन के लिए घर में ही यज्ञ कुण्ड जैसा बनाकर या किसी लोहे या ताँबे के पात्र में आम की लकड़ी, गोबर के कण्डे जलाकर घर में ही चारू सामग्री तैयार करके हवन करें। ये हवन की चारू सामग्री जो तिल, शक्कर, घी, चावल से मिलकर बनती है, पूरे १०८ बार शनि महामंत्र की इससे आहुति दें और १०८ बार महालक्ष्मी मंत्र की इससे आहुति दें। शनिदेव को बाद में उड़द, तिल, गुड़ से बने पकवान अग्नि में समर्पित करें। लक्ष्मी जी को ३३ बार खीर-पूड़ी की आहुति समर्पित करें। फिर एक-एक करके सूखा नारियल दोनों देवी-देवताओं के मंत्र के साथ पूर्णाहुति के लिए अग्नि में डालें। गुरू गणपति जी के लिए घी की आहुति दें। यह बड़ा प्रभावकारी उपाय है।
दीपावली का पावन त्यौहार “कार्य सिद्धी” एवं “आर्थिक समृद्धि” सम्बन्धित प्रयोगों को सफलता पूर्वक सिद्ध करने के लिए अबुझ मुहूर्त है। छोटे-छोटे प्रयोगों को करके भी हम आर्थिक समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं। आप भी अपने अनुकूल एक या एक से अधिक प्रयोगों को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ करें। आपकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी और माँ लक्ष्मी की कृपा अवश्य प्राप्त होगी।
प्रयोग ४ : आर्थिक वृद्धि के लिए सदैव शनिवार के दिन गेहूँ पिसवायें तथा गेहूँ में एक मुट्ठी काला चना अवश्य डालें।
प्रयोग ५ : यदि आपके घर में पहली संतान पुत्र के रूप में प्राप्त हो, तो उसका दाँत जब भी गिरे उसे ज़मीन पर गिरने से पहले हाथ से उठाकर पवित्र स्थान पर रख दें और गुरू पुष्य नक्षत्र में दाँत को गंगा जल से शुद्ध करें और उसे धूप-दीप दिखाकर चाँदी की डिबिया में रख लेवें। इस डिबिया को सदैव अपने पास रखें या अपने धन स्थान में रखें। जब बच्चे के जन्म नक्षत्र आवे तो पुन: दाँत को शुद्ध करें और उसे धूप-दीप दिखायें ऐसा प्रत्येक माह करें। आपके पास धन की कोई कमी नहीं होगी।
प्रयोग ६ : यदि आप आर्थिक रूप से बहुत ही समस्याग्रस्त हैं तो २१ शुक्रवार “वैभव लक्ष्मी” का पूजन करें, व्रत करें और एक वर्ष से कम आयु की ५ कन्याओं को खीर एवं मिश्री प्रत्येक शुक्रवार को खिलायें। कुछ समय बाद ही आपकी परेशानी कम होने लगेगी।
प्रयोग ७ : यह एक ऐसा प्रयोग हैं जिससे आर्थिक सम्पन्नता स्थायी रूप से प्राप्त की जा सकती है। आप यह प्रयोग दीपावली की रात्रि को करें। इसे आप स्वयं भी कर सकते हैं या किसी योग्य ब्राह्मण से करवा सकते हैं।
दीपावली की रात्रि में एक मोती शंख या दक्षिणावर्ती शंख को दीपावली पूजन के साथ ही पूजें। किसी भी लक्ष्मी मंत्र की पाँच माला या “श्री सूक्त” के सात पाठ करें। शंख को पूजा स्थान पर ही रहने दें। अगले दिन प्रात:काल स्नान करके लाल आसन पर बैठकर अपने सामने शंख को रख कर उसी मंत्र का या “श्री सूक्त” का पाठ करें। प्रत्येक मंत्र के के बाद एक साबुत चावल का दाना शंख में डालें। इस प्रकार आप १०८ बार मंत्र पाठ कर इतने ही चावल के दाने शंख में डालें। इस प्रकार प्रत्येक दिन पाठ करें। यह आपको तब तक करना हैं जब तक कि शंख चावलों से न भर जाये। जिस दिन शंख भर जाये उस दिन शाम को एक सुहागिन, पाँच एक वर्ष से कम की कन्यायें और कम-से-कम एक ब्राह्मण को भोजन कराके और दक्षिणा देकर विदा करें तथा शंख को किसी लाल वस्त्र में बाँधकर अपने धन स्थान में रख दें। जिस दिन यह प्रयोग समाप्त हो, उसके ४० दिन तक शंख को धूप अवश्य दिखायें। इसके बाद शंख को पूजा स्थान या धन स्थान पर रखकर भूल जायें। आपके इस प्रयोग से माँ लक्ष्मी का आपके यहाँ स्थायी वास हो जायेगा। सावधानी यह रखें कि इस प्रयोग की चर्चा किसी से ना करें और जो चावल प्रयोग में लायें वो खण्डित ना हो। ऐसा लगातार चार दिन तक करें। आप पर माँ लक्ष्मी की अवश्य कृपा होगी।
शास्त्रानुसार प्रत्येक पूर्णिमा पर प्रात: १० बजे पीपल वृक्ष पर माँ लक्ष्मी का फेरा लगता है। इसलिए जो व्यक्ति आर्थिक रूप से परेशान हो, वो इस समय पीपल के वृक्ष के पास जाये, उसका पूजन करें, जल चढ़ाये और लक्ष्मी जी की उपासना करे और कम-से-कम कोई भी एक लक्ष्मी मंत्र की एक माला करके आये।
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पं0 दयानन्द शास्त्री
दीपावली के दिन घनी काली अंधेरी रात होती है। काली अंधेरी रात या कोई भी अंधकार कष्ट का प्रतीक माना गया है, क्योंकि अंधकार में मार्ग दिखाई नहीं देता, व्यक्ति रास्ता भटक जाता है। मन में जब तक दुख: का, ग़म का अंधेरा रहेगा, तब तक व्यक्ति सफलता नहीं पा सकेगा। अंधेरे से उजाले की ओर जाने की प्रक्रिया को ही अमावस्या शांति कहते हैं। जितनी अधिक काली अंधेरी रात होती है, वह इस बात की प्रतीक है कि अब आगे जल्दी रोशनी का पहर आने वाला है। जैसे-जैसे सुबह नज़दीक आती है, अंधेरा और बढ़ता जाता हैं। जैसे-जैसे सुबह की किरण फूटने वाली होती है, व्यक्ति दुनिया की सुध-बुध भूलकर चैन से सोना चाहता है। सुबह का आना इस बात का प्रमाण है कि कोई भी अंधेरा अधिक समय तक नहीं टिकता। अधिक ग़म, अधिक ख़ुशी अधिक समय तक नहीं टिकती। अत्यधिक ग़म इस बात का संकेत हैं कि अब जल्दी ही ख़ुशी मिलने वाली है, अत्यधिक नींद इस बात का संकेत हैं कि सपनों की दुनिया के आगे वास्तविक उपलब्धि हाथ से जाने वाली है। कहा भी गया हैं कि ’जो सोवत हैं वो खोवत है, जो जागत है वो पावत है’ अर्थात ब्रह्म मुहूर्त के बाद सोना ज़िंदगी में बहुत कुछ खो देने का संकेत कहा गया है।
दीपावली की अमावस्या के दिन लकड़ी की दो चौकी लें। जिस दिन दीपावली की अमावस्या पड़े, उस दिन उस समयावधि से पहले सरसों के तेल का एक बड़ा दिया जला देवें और शनिदेव की तस्वीर, प्रतिमा या मंत्र के आगे तेल का दिया रखकर यह प्रार्थना करें कि हमारे घर में लक्ष्मी के आगमन में, सफलता में जो भी विघ्न, बाधा, परेशानी, रुकावट आ रही हैं, वे दूर हो जायें और उस दिये को अखण्ड जलने दें। दूसरे दिन के दीपावली पूजन हो जाने तक उसे जलाना चाहिए। जब दीपावली पूजन का मुहूर्त हो, उस समय लकड़ी की एक चौकी पर महालक्ष्मी माता की तस्वीर रखें और दूसरी चौकी पर शनि देव की तस्वीर, काला वस्त्र चौकी पर बिछाकर रखें। लक्ष्मी जी वाली चौकी पर रक्त लाल रंग का वस्त्र बिछायें। लक्ष्मी जी की हल्दी, कुमकुम, अष्टगंध, मिष्ठान, खील-बताशे, पकवान व खीर-पूड़ी अर्पण कर विधिवत पूजन करें। उन्हें लाल पुष्प व लाल वस्त्र अर्पण करें। शनिदेव को काले अक्षत, नीले पुष्प से पूजन करके, उड़द व तिल से बने पकवान भोग में अर्पण करें। जब भोग लगायें, तब जल भी साथ में रखें। एक-एक सूखा नारियल और एक-एक पानी वाला नारियल दोनों चौकी पर रखें। सामने बैठकर एक माला शनि महामंत्र की और एक माला महालक्ष्मी मंत्र की जाप करें। मंत्र जाप प्रत्येक सदस्य भी अपने-अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए व जीवन में वैभव की प्राप्ति के लिए कर सकता है। जो मंत्र जाप करने हैं, वे निम्न हैं :
शनि महामंत्र
ऊँ नीलांजन समाभासं रवि पुत्रं यमाग्रजम्।
छाया मार्तण्ड सम्भूतं तम् नमामि शनैश्चरम्।।
महालक्ष्मी मंत्र
ऊँ श्रीं ह्यीं कमले कमलालये प्रसीद श्रीं ह्यीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मये नम:।
इन दोनों मंत्रों के जाप के पूर्व अपने गुरू का व गणपति जी का मंत्र भी ११-११ बार पाठ कर लें। मंत्र पाठ के बाद आरती करें, कपूर जलायें। फिर जो भी प्रसाद शनिदेव के आगे रखा है और जो भी लक्ष्मी जी के आगे रखा हो, वो सभी अलग-अलग कपड़े में बाँध दें। शनिदेव के काले वस्त्र की चौकी पर उड़द, तिल, गुड़ के जो भी पकवान उड़द, तिल, गुड़ के साथ रखे थे, उन्हें काले कपड़े में बांध दें और लक्ष्मी जी वाला सारा सामान लाल कपड़े में बांध दें। मगर दोनों चौकी से पानी वाला नारियल अलग निकाल कर सामान को बांधना हैं। काले कपड़े वाला सामान किसी ग़रीब को या भिखारी को उसी रात्रि में दे दें। साथ में एक भोजन का बड़ा पेकेट भी उसे भोजन करने के लिए दें। लाल कपड़े वाला सामान किसी भी मंदिर के पुरोहित को दे दें। पानी वाले नारियल जो अलग निकाले थे, दोनों अपने घर के दरवाज़े पर यह कहकर फोड़ें कि मेरी ज़िन्दगी में धन प्राप्ति में, सफलता प्राप्ति में जो भी बाधा आ रही हैं उसे दूर करने के लिए हम यह श्रीफल बलि दे रहे हैं। नारियल फोड़ने के बाद उसके दोनों टुकड़ों में शक्कर में थोड़ा-सा दो चम्मच घी मिलाकर भर देवें। शक्कर से भरे यह नारियल अपने घर के अंदर या बाहर पीपल के बड़े पेड़ के नीचे ऐसी जगह पर अलग-अलग रखें, जहाँ पर खूब चीटिंया लगनी चाहिए। इस प्रकार से शनिदेव का प्रकोप इस दिन शांत होता हैं और महालक्ष्मी जी शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं। यदि घर में या घर के आस-पास कोई विधवा महिला हो तो दीपावली वाले दिन उसे भोजन, उपहार, वस्त्र आदि श्रद्धा से अवश्य देना चाहिए। ऐसा करने से सुहाग अमर होता है और परिवार में सुख बढ़ता है।
दूसरा उपाय यह हैं कि शनि मंत्र का और श्री यंत्र का अभिषेक पंचामृत से करें। फिर शुद्ध जल में धोकर व पोंछकर, अष्टगंध, केशर, चंदन से यंत्रों को लेपित करें। पुष्प, धूप, दीप, अगरबत्ती से आरती करके प्रसाद, मिष्ठान का अर्पण करें। दोनों यंत्रों के आगे अलग-अलग थाली में एक व्यक्ति की खुराक के बराबर भोजन सजाकर रखें। रात्रि भर भोजन रखा रहने दें। दूसरे दिन वह भोजन श्रद्धा से गाय को खिलाकर आयें।
तीसरा उपाय यह हैं कि दीपावली के दिन शनिदेव की प्रसन्नता व लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्ति हेतु महालक्ष्मी पूजन के मुहूर्त में हवन ज़रूर करें। हवन के लिए घर में ही यज्ञ कुण्ड जैसा बनाकर या किसी लोहे या ताँबे के पात्र में आम की लकड़ी, गोबर के कण्डे जलाकर घर में ही चारू सामग्री तैयार करके हवन करें। ये हवन की चारू सामग्री जो तिल, शक्कर, घी, चावल से मिलकर बनती है, पूरे १०८ बार शनि महामंत्र की इससे आहुति दें और १०८ बार महालक्ष्मी मंत्र की इससे आहुति दें। शनिदेव को बाद में उड़द, तिल, गुड़ से बने पकवान अग्नि में समर्पित करें। लक्ष्मी जी को ३३ बार खीर-पूड़ी की आहुति समर्पित करें। फिर एक-एक करके सूखा नारियल दोनों देवी-देवताओं के मंत्र के साथ पूर्णाहुति के लिए अग्नि में डालें। गुरू गणपति जी के लिए घी की आहुति दें। यह बड़ा प्रभावकारी उपाय है।
दीपावली का पावन त्यौहार “कार्य सिद्धी” एवं “आर्थिक समृद्धि” सम्बन्धित प्रयोगों को सफलता पूर्वक सिद्ध करने के लिए अबुझ मुहूर्त है। छोटे-छोटे प्रयोगों को करके भी हम आर्थिक समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं। आप भी अपने अनुकूल एक या एक से अधिक प्रयोगों को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ करें। आपकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी और माँ लक्ष्मी की कृपा अवश्य प्राप्त होगी।
प्रयोग ४ : आर्थिक वृद्धि के लिए सदैव शनिवार के दिन गेहूँ पिसवायें तथा गेहूँ में एक मुट्ठी काला चना अवश्य डालें।
प्रयोग ५ : यदि आपके घर में पहली संतान पुत्र के रूप में प्राप्त हो, तो उसका दाँत जब भी गिरे उसे ज़मीन पर गिरने से पहले हाथ से उठाकर पवित्र स्थान पर रख दें और गुरू पुष्य नक्षत्र में दाँत को गंगा जल से शुद्ध करें और उसे धूप-दीप दिखाकर चाँदी की डिबिया में रख लेवें। इस डिबिया को सदैव अपने पास रखें या अपने धन स्थान में रखें। जब बच्चे के जन्म नक्षत्र आवे तो पुन: दाँत को शुद्ध करें और उसे धूप-दीप दिखायें ऐसा प्रत्येक माह करें। आपके पास धन की कोई कमी नहीं होगी।
प्रयोग ६ : यदि आप आर्थिक रूप से बहुत ही समस्याग्रस्त हैं तो २१ शुक्रवार “वैभव लक्ष्मी” का पूजन करें, व्रत करें और एक वर्ष से कम आयु की ५ कन्याओं को खीर एवं मिश्री प्रत्येक शुक्रवार को खिलायें। कुछ समय बाद ही आपकी परेशानी कम होने लगेगी।
प्रयोग ७ : यह एक ऐसा प्रयोग हैं जिससे आर्थिक सम्पन्नता स्थायी रूप से प्राप्त की जा सकती है। आप यह प्रयोग दीपावली की रात्रि को करें। इसे आप स्वयं भी कर सकते हैं या किसी योग्य ब्राह्मण से करवा सकते हैं।
दीपावली की रात्रि में एक मोती शंख या दक्षिणावर्ती शंख को दीपावली पूजन के साथ ही पूजें। किसी भी लक्ष्मी मंत्र की पाँच माला या “श्री सूक्त” के सात पाठ करें। शंख को पूजा स्थान पर ही रहने दें। अगले दिन प्रात:काल स्नान करके लाल आसन पर बैठकर अपने सामने शंख को रख कर उसी मंत्र का या “श्री सूक्त” का पाठ करें। प्रत्येक मंत्र के के बाद एक साबुत चावल का दाना शंख में डालें। इस प्रकार आप १०८ बार मंत्र पाठ कर इतने ही चावल के दाने शंख में डालें। इस प्रकार प्रत्येक दिन पाठ करें। यह आपको तब तक करना हैं जब तक कि शंख चावलों से न भर जाये। जिस दिन शंख भर जाये उस दिन शाम को एक सुहागिन, पाँच एक वर्ष से कम की कन्यायें और कम-से-कम एक ब्राह्मण को भोजन कराके और दक्षिणा देकर विदा करें तथा शंख को किसी लाल वस्त्र में बाँधकर अपने धन स्थान में रख दें। जिस दिन यह प्रयोग समाप्त हो, उसके ४० दिन तक शंख को धूप अवश्य दिखायें। इसके बाद शंख को पूजा स्थान या धन स्थान पर रखकर भूल जायें। आपके इस प्रयोग से माँ लक्ष्मी का आपके यहाँ स्थायी वास हो जायेगा। सावधानी यह रखें कि इस प्रयोग की चर्चा किसी से ना करें और जो चावल प्रयोग में लायें वो खण्डित ना हो। ऐसा लगातार चार दिन तक करें। आप पर माँ लक्ष्मी की अवश्य कृपा होगी।
शास्त्रानुसार प्रत्येक पूर्णिमा पर प्रात: १० बजे पीपल वृक्ष पर माँ लक्ष्मी का फेरा लगता है। इसलिए जो व्यक्ति आर्थिक रूप से परेशान हो, वो इस समय पीपल के वृक्ष के पास जाये, उसका पूजन करें, जल चढ़ाये और लक्ष्मी जी की उपासना करे और कम-से-कम कोई भी एक लक्ष्मी मंत्र की एक माला करके आये।
दीपावली पर धन-प्राप्ति के चमत्कारी प्रयोग
दीपावली पर धन-प्राप्ति के चमत्कारी प्रयोग
दीपावली के दिन घनी काली अंधेरी रात होती है।
काली अंधेरी रात या कोई भी अंधकार कष्ट का प्रतीक माना गया है, क्योंकि अंधकार में मार्ग दिखाई नहीं देता, व्यक्ति रास्ता भटक जाता है।
मन में जब तक दुख: का, ग़म का अंधेरा रहेगा, तब तक व्यक्ति सफलता नहीं पा सकेगा।
अंधेरे से उजाले की ओर जाने की प्रक्रिया को ही अमावस्या शांति कहते हैं।
जितनी अधिक काली अंधेरी रात होती है, वह इस बात की प्रतीक है कि अब आगे जल्दी रोशनी का पहर आने वाला है। जैसे-जैसे सुबह नज़दीक आती है, अंधेरा और बढ़ता जाता हैं। जैसे-जैसे सुबह की किरण फूटने वाली होती है, व्यक्ति दुनिया की सुध-बुध भूलकर चैन से सोना चाहता है।
सुबह का आना इस बात का प्रमाण है कि कोई भी अंधेरा अधिक समय तक नहीं टिकता।
अत्यधिक ग़म इस बात का संकेत हैं कि अब जल्दी ही ख़ुशी मिलने वाली है, अत्यधिक नींद इस बात का संकेत हैं कि सपनों की दुनिया के आगे वास्तविक उपलब्धि हाथ से जाने वाली है।
कहा भी गया हैं कि ’जो सोवत हैं वो खोवत है, जो जागत है वो पावत है’ अर्थात ब्रह्म मुहूर्त के बाद सोना ज़िंदगी में बहुत कुछ खो देने का संकेत कहा गया है।
दीपावली की अमावस्या के दिन लकड़ी की दो चौकी लें।
जिस दिन दीपावली की अमावस्या पड़े, उस दिन उस समयावधि से पहले सरसों के तेल का एक बड़ा दिया जला देवें और शनिदेव की तस्वीर, प्रतिमा या मंत्र के आगे तेल का दिया रखकर यह प्रार्थना करें कि हमारे घर में लक्ष्मी के आगमन में, सफलता में जो भी विघ्न, बाधा, परेशानी, रुकावट आ रही हैं, वे दूर हो जायें और उस दिये को अखण्ड जलने दें।
दूसरे दिन के दीपावली पूजन हो जाने तक उसे जलाना चाहिए।
जब दीपावली पूजन का मुहूर्त हो, उस समय लकड़ी की एक चौकी पर महालक्ष्मी माता की तस्वीर रखें और दूसरी चौकी पर शनि देव की तस्वीर, काला वस्त्र चौकी पर बिछाकर रखें।
लक्ष्मी जी वाली चौकी पर रक्त लाल रंग का वस्त्र बिछायें।
लक्ष्मी जी की हल्दी, कुमकुम, अष्टगंध, मिष्ठान, खील-बताशे, पकवान व खीर-पूड़ी अर्पण कर विधिवत पूजन करें।
उन्हें लाल पुष्प व लाल वस्त्र अर्पण करें।
शनिदेव को काले अक्षत, नीले पुष्प से पूजन करके, उड़द व तिल से बने पकवान भोग में अर्पण करें।
जब भोग लगायें, तब जल भी साथ में रखें।
एक-एक सूखा नारियल और एक-एक पानी वाला नारियल दोनों चौकी पर रखें।
सामने बैठकर एक माला शनि महामंत्र की और एक माला महालक्ष्मी मंत्र की जाप करें।
मंत्र जाप प्रत्येक सदस्य भी अपने-अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए व जीवन में वैभव की प्राप्ति के लिए कर सकता है।
जो मंत्र जाप करने हैं, वे निम्न हैं :
शनि महामंत्र
ऊँ नीलांजन समाभासं रवि पुत्रं यमाग्रजम्।
छाया मार्तण्ड सम्भूतं तम् नमामि शनैश्चरम्।।
महालक्ष्मी मंत्र
ऊँ श्रीं ह्यीं कमले कमलालये प्रसीद श्रीं ह्यीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मये नम:।
इन दोनों मंत्रों के जाप के पूर्व अपने गुरू का व गणपति जी का मंत्र भी ११-११ बार पाठ कर लें।
मंत्र पाठ के बाद आरती करें, कपूर जलायें।
फिर जो भी प्रसाद शनिदेव के आगे रखा है और जो भी लक्ष्मी जी के आगे रखा हो, वो सभी अलग-अलग कपड़े में बाँध दें।
शनिदेव के काले वस्त्र की चौकी पर उड़द, तिल, गुड़ के जो भी पकवान उड़द, तिल, गुड़ के साथ रखे थे, उन्हें काले कपड़े में बांध दें और लक्ष्मी जी वाला सारा सामान लाल कपड़े में बांध दें।
मगर दोनों चौकी से पानी वाला नारियल अलग निकाल कर सामान को बांधना हैं।
काले कपड़े वाला सामान किसी ग़रीब को या भिखारी को उसी रात्रि में दे दें।
साथ में एक भोजन का बड़ा पेकेट भी उसे भोजन करने के लिए दें।
लाल कपड़े वाला सामान किसी भी मंदिर के पुरोहित को दे दें।
पानी वाले नारियल जो अलग निकाले थे, दोनों अपने घर के दरवाज़े पर यह कहकर फोड़ें कि मेरी ज़िन्दगी में धन प्राप्ति में, सफलता प्राप्ति में जो भी बाधा आ रही हैं उसे दूर करने के लिए हम यह श्रीफल बलि दे रहे हैं।
नारियल फोड़ने के बाद उसके दोनों टुकड़ों में शक्कर में थोड़ा-सा दो चम्मच घी मिलाकर भर देवें।
शक्कर से भरे यह नारियल अपने घर के अंदर या बाहर पीपल के बड़े पेड़ के नीचे ऐसी जगह पर अलग-अलग रखें, जहाँ पर खूब चीटिंया लगनी चाहिए। इस प्रकार से शनिदेव का प्रकोप इस दिन शांत होता हैं और महालक्ष्मी जी शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं।
यदि घर में या घर के आस-पास कोई विधवा महिला हो तो दीपावली वाले दिन उसे भोजन, उपहार, वस्त्र आदि श्रद्धा से अवश्य देना चाहिए।
ऐसा करने से सुहाग अमर होता है और परिवार में सुख बढ़ता है।
दूसरा उपाय यह हैं कि शनि मंत्र का और श्री यंत्र का अभिषेक पंचामृत से करें।
फिर शुद्ध जल में धोकर व पोंछकर, अष्टगंध, केशर, चंदन से यंत्रों को लेपित करें।
पुष्प, धूप, दीप, अगरबत्ती से आरती करके प्रसाद, मिष्ठान का अर्पण करें।
दोनों यंत्रों के आगे अलग-अलग थाली में एक व्यक्ति की खुराक के बराबर भोजन सजाकर रखें।
रात्रि भर भोजन रखा रहने दें। दूसरे दिन वह भोजन श्रद्धा से गाय को खिलाकर आयें।
तीसरा उपाय यह हैं कि दीपावली के दिन शनिदेव की प्रसन्नता व लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्ति हेतु महालक्ष्मी पूजन के मुहूर्त में हवन ज़रूर करें।
हवन के लिए घर में ही यज्ञ कुण्ड जैसा बनाकर या किसी लोहे या ताँबे के पात्र में आम की लकड़ी, गोबर के कण्डे जलाकर घर में ही चारू सामग्री तैयार करके हवन करें।
ये हवन की चारू सामग्री जो तिल, शक्कर, घी, चावल से मिलकर बनती है, पूरे १०८ बार शनि महामंत्र की इससे आहुति दें और १०८ बार महालक्ष्मी मंत्र की इससे आहुति दें। शनिदेव को बाद में उड़द, तिल, गुड़ से बने पकवान अग्नि में समर्पित करें। लक्ष्मी जी को ३३ बार खीर-पूड़ी की आहुति समर्पित करें।
फिर एक-एक करके सूखा नारियल दोनों देवी-देवताओं के मंत्र के साथ पूर्णाहुति के लिए अग्नि में डालें।
गुरू गणपति जी के लिए घी की आहुति दें। यह बड़ा प्रभावकारी उपाय है।
दीपावली का पावन त्यौहार “कार्य सिद्धी” एवं “आर्थिक समृद्धि” सम्बन्धित प्रयोगों को सफलता पूर्वक सिद्ध करने के लिए अबुझ मुहूर्त है। छोटे-छोटे प्रयोगों को करके भी हम आर्थिक समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं। आप भी अपने अनुकूल एक या एक से अधिक प्रयोगों को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ करें। आपकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी और माँ लक्ष्मी की कृपा अवश्य प्राप्त होगी।
आर्थिक वृद्धि के लिए सदैव शनिवार के दिन गेहूँ पिसवायें तथा गेहूँ में एक मुट्ठी काला चना अवश्य डालें।
यदि आपके घर में पहली संतान पुत्र के रूप में प्राप्त हो, तो उसका दाँत जब भी गिरे उसे ज़मीन पर गिरने से पहले हाथ से उठाकर पवित्र स्थान पर रख दें और गुरू पुष्य नक्षत्र में दाँत को गंगा जल से शुद्ध करें और उसे धूप-दीप दिखाकर चाँदी की डिबिया में रख लेवें। इस डिबिया को सदैव अपने पास रखें या अपने धन स्थान में रखें। जब बच्चे के जन्म नक्षत्र आवे तो पुन: दाँत को शुद्ध करें और उसे धूप-दीप दिखायें ऐसा प्रत्येक माह करें। आपके पास धन की कोई कमी नहीं होगी।
यदि आप आर्थिक रूप से बहुत ही समस्याग्रस्त हैं तो २१ शुक्रवार “वैभव लक्ष्मी” का पूजन करें, व्रत करें और एक वर्ष से कम आयु की ५ कन्याओं को खीर एवं मिश्री प्रत्येक शुक्रवार को खिलायें। कुछ समय बाद ही आपकी परेशानी कम होने लगेगी।
यह एक ऐसा प्रयोग हैं जिससे आर्थिक सम्पन्नता स्थायी रूप से प्राप्त की जा सकती है। आप यह प्रयोग दीपावली की रात्रि को करें। इसे आप स्वयं भी कर सकते हैं या किसी योग्य ब्राह्मण से करवा सकते हैं।
दीपावली की रात्रि में एक मोती शंख या दक्षिणावर्ती शंख को दीपावली पूजन के साथ ही पूजें।
किसी भी लक्ष्मी मंत्र की पाँच माला या “श्री सूक्त” के सात पाठ करें।
शंख को पूजा स्थान पर ही रहने दें। अगले दिन प्रात:काल स्नान करके लाल आसन पर बैठकर अपने सामने शंख को रख कर उसी मंत्र का या “श्री सूक्त” का पाठ करें। प्रत्येक मंत्र के के बाद एक साबुत चावल का दाना शंख में डालें।
इस प्रकार आप १०८ बार मंत्र पाठ कर इतने ही चावल के दाने शंख में डालें। इस प्रकार प्रत्येक दिन पाठ करें।
यह आपको तब तक करना हैं जब तक कि शंख चावलों से न भर जाये। जिस दिन शंख भर जाये उस दिन शाम को एक सुहागिन, पाँच एक वर्ष से कम की कन्यायें और कम-से-कम एक ब्राह्मण को भोजन कराके और दक्षिणा देकर विदा करें तथा शंख को किसी लाल वस्त्र में बाँधकर अपने धन स्थान में रख दें।
जिस दिन यह प्रयोग समाप्त हो, उसके ४० दिन तक शंख को धूप अवश्य दिखायें।
इसके बाद शंख को पूजा स्थान या धन स्थान पर रखकर भूल जायें।
आपके इस प्रयोग से माँ लक्ष्मी का आपके यहाँ स्थायी वास हो जायेगा।
सावधानी यह रखें कि इस प्रयोग की चर्चा किसी से ना करें और जो चावल प्रयोग में लायें वो खण्डित ना हो।
ऐसा लगातार चार दिन तक करें।
आप पर माँ लक्ष्मी की अवश्य कृपा होगी।
शास्त्रानुसार प्रत्येक पूर्णिमा पर प्रात: १० बजे पीपल वृक्ष पर माँ लक्ष्मी का फेरा लगता है।
इसलिए जो व्यक्ति आर्थिक रूप से परेशान हो, वो इस समय पीपल के वृक्ष के पास जाये, उसका पूजन करें, जल चढ़ाये और लक्ष्मी जी की उपासना करे और कम-से-कम कोई भी एक लक्ष्मी मंत्र की एक माला करके आये।
दीपावली के दिन घनी काली अंधेरी रात होती है।
काली अंधेरी रात या कोई भी अंधकार कष्ट का प्रतीक माना गया है, क्योंकि अंधकार में मार्ग दिखाई नहीं देता, व्यक्ति रास्ता भटक जाता है।
मन में जब तक दुख: का, ग़म का अंधेरा रहेगा, तब तक व्यक्ति सफलता नहीं पा सकेगा।
अंधेरे से उजाले की ओर जाने की प्रक्रिया को ही अमावस्या शांति कहते हैं।
जितनी अधिक काली अंधेरी रात होती है, वह इस बात की प्रतीक है कि अब आगे जल्दी रोशनी का पहर आने वाला है। जैसे-जैसे सुबह नज़दीक आती है, अंधेरा और बढ़ता जाता हैं। जैसे-जैसे सुबह की किरण फूटने वाली होती है, व्यक्ति दुनिया की सुध-बुध भूलकर चैन से सोना चाहता है।
सुबह का आना इस बात का प्रमाण है कि कोई भी अंधेरा अधिक समय तक नहीं टिकता।
अत्यधिक ग़म इस बात का संकेत हैं कि अब जल्दी ही ख़ुशी मिलने वाली है, अत्यधिक नींद इस बात का संकेत हैं कि सपनों की दुनिया के आगे वास्तविक उपलब्धि हाथ से जाने वाली है।
कहा भी गया हैं कि ’जो सोवत हैं वो खोवत है, जो जागत है वो पावत है’ अर्थात ब्रह्म मुहूर्त के बाद सोना ज़िंदगी में बहुत कुछ खो देने का संकेत कहा गया है।
दीपावली की अमावस्या के दिन लकड़ी की दो चौकी लें।
जिस दिन दीपावली की अमावस्या पड़े, उस दिन उस समयावधि से पहले सरसों के तेल का एक बड़ा दिया जला देवें और शनिदेव की तस्वीर, प्रतिमा या मंत्र के आगे तेल का दिया रखकर यह प्रार्थना करें कि हमारे घर में लक्ष्मी के आगमन में, सफलता में जो भी विघ्न, बाधा, परेशानी, रुकावट आ रही हैं, वे दूर हो जायें और उस दिये को अखण्ड जलने दें।
दूसरे दिन के दीपावली पूजन हो जाने तक उसे जलाना चाहिए।
जब दीपावली पूजन का मुहूर्त हो, उस समय लकड़ी की एक चौकी पर महालक्ष्मी माता की तस्वीर रखें और दूसरी चौकी पर शनि देव की तस्वीर, काला वस्त्र चौकी पर बिछाकर रखें।
लक्ष्मी जी वाली चौकी पर रक्त लाल रंग का वस्त्र बिछायें।
लक्ष्मी जी की हल्दी, कुमकुम, अष्टगंध, मिष्ठान, खील-बताशे, पकवान व खीर-पूड़ी अर्पण कर विधिवत पूजन करें।
उन्हें लाल पुष्प व लाल वस्त्र अर्पण करें।
शनिदेव को काले अक्षत, नीले पुष्प से पूजन करके, उड़द व तिल से बने पकवान भोग में अर्पण करें।
जब भोग लगायें, तब जल भी साथ में रखें।
एक-एक सूखा नारियल और एक-एक पानी वाला नारियल दोनों चौकी पर रखें।
सामने बैठकर एक माला शनि महामंत्र की और एक माला महालक्ष्मी मंत्र की जाप करें।
मंत्र जाप प्रत्येक सदस्य भी अपने-अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए व जीवन में वैभव की प्राप्ति के लिए कर सकता है।
जो मंत्र जाप करने हैं, वे निम्न हैं :
शनि महामंत्र
ऊँ नीलांजन समाभासं रवि पुत्रं यमाग्रजम्।
छाया मार्तण्ड सम्भूतं तम् नमामि शनैश्चरम्।।
महालक्ष्मी मंत्र
ऊँ श्रीं ह्यीं कमले कमलालये प्रसीद श्रीं ह्यीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मये नम:।
इन दोनों मंत्रों के जाप के पूर्व अपने गुरू का व गणपति जी का मंत्र भी ११-११ बार पाठ कर लें।
मंत्र पाठ के बाद आरती करें, कपूर जलायें।
फिर जो भी प्रसाद शनिदेव के आगे रखा है और जो भी लक्ष्मी जी के आगे रखा हो, वो सभी अलग-अलग कपड़े में बाँध दें।
शनिदेव के काले वस्त्र की चौकी पर उड़द, तिल, गुड़ के जो भी पकवान उड़द, तिल, गुड़ के साथ रखे थे, उन्हें काले कपड़े में बांध दें और लक्ष्मी जी वाला सारा सामान लाल कपड़े में बांध दें।
मगर दोनों चौकी से पानी वाला नारियल अलग निकाल कर सामान को बांधना हैं।
काले कपड़े वाला सामान किसी ग़रीब को या भिखारी को उसी रात्रि में दे दें।
साथ में एक भोजन का बड़ा पेकेट भी उसे भोजन करने के लिए दें।
लाल कपड़े वाला सामान किसी भी मंदिर के पुरोहित को दे दें।
पानी वाले नारियल जो अलग निकाले थे, दोनों अपने घर के दरवाज़े पर यह कहकर फोड़ें कि मेरी ज़िन्दगी में धन प्राप्ति में, सफलता प्राप्ति में जो भी बाधा आ रही हैं उसे दूर करने के लिए हम यह श्रीफल बलि दे रहे हैं।
नारियल फोड़ने के बाद उसके दोनों टुकड़ों में शक्कर में थोड़ा-सा दो चम्मच घी मिलाकर भर देवें।
शक्कर से भरे यह नारियल अपने घर के अंदर या बाहर पीपल के बड़े पेड़ के नीचे ऐसी जगह पर अलग-अलग रखें, जहाँ पर खूब चीटिंया लगनी चाहिए। इस प्रकार से शनिदेव का प्रकोप इस दिन शांत होता हैं और महालक्ष्मी जी शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं।
यदि घर में या घर के आस-पास कोई विधवा महिला हो तो दीपावली वाले दिन उसे भोजन, उपहार, वस्त्र आदि श्रद्धा से अवश्य देना चाहिए।
ऐसा करने से सुहाग अमर होता है और परिवार में सुख बढ़ता है।
दूसरा उपाय यह हैं कि शनि मंत्र का और श्री यंत्र का अभिषेक पंचामृत से करें।
फिर शुद्ध जल में धोकर व पोंछकर, अष्टगंध, केशर, चंदन से यंत्रों को लेपित करें।
पुष्प, धूप, दीप, अगरबत्ती से आरती करके प्रसाद, मिष्ठान का अर्पण करें।
दोनों यंत्रों के आगे अलग-अलग थाली में एक व्यक्ति की खुराक के बराबर भोजन सजाकर रखें।
रात्रि भर भोजन रखा रहने दें। दूसरे दिन वह भोजन श्रद्धा से गाय को खिलाकर आयें।
तीसरा उपाय यह हैं कि दीपावली के दिन शनिदेव की प्रसन्नता व लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्ति हेतु महालक्ष्मी पूजन के मुहूर्त में हवन ज़रूर करें।
हवन के लिए घर में ही यज्ञ कुण्ड जैसा बनाकर या किसी लोहे या ताँबे के पात्र में आम की लकड़ी, गोबर के कण्डे जलाकर घर में ही चारू सामग्री तैयार करके हवन करें।
ये हवन की चारू सामग्री जो तिल, शक्कर, घी, चावल से मिलकर बनती है, पूरे १०८ बार शनि महामंत्र की इससे आहुति दें और १०८ बार महालक्ष्मी मंत्र की इससे आहुति दें। शनिदेव को बाद में उड़द, तिल, गुड़ से बने पकवान अग्नि में समर्पित करें। लक्ष्मी जी को ३३ बार खीर-पूड़ी की आहुति समर्पित करें।
फिर एक-एक करके सूखा नारियल दोनों देवी-देवताओं के मंत्र के साथ पूर्णाहुति के लिए अग्नि में डालें।
गुरू गणपति जी के लिए घी की आहुति दें। यह बड़ा प्रभावकारी उपाय है।
दीपावली का पावन त्यौहार “कार्य सिद्धी” एवं “आर्थिक समृद्धि” सम्बन्धित प्रयोगों को सफलता पूर्वक सिद्ध करने के लिए अबुझ मुहूर्त है। छोटे-छोटे प्रयोगों को करके भी हम आर्थिक समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं। आप भी अपने अनुकूल एक या एक से अधिक प्रयोगों को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ करें। आपकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी और माँ लक्ष्मी की कृपा अवश्य प्राप्त होगी।
आर्थिक वृद्धि के लिए सदैव शनिवार के दिन गेहूँ पिसवायें तथा गेहूँ में एक मुट्ठी काला चना अवश्य डालें।
यदि आपके घर में पहली संतान पुत्र के रूप में प्राप्त हो, तो उसका दाँत जब भी गिरे उसे ज़मीन पर गिरने से पहले हाथ से उठाकर पवित्र स्थान पर रख दें और गुरू पुष्य नक्षत्र में दाँत को गंगा जल से शुद्ध करें और उसे धूप-दीप दिखाकर चाँदी की डिबिया में रख लेवें। इस डिबिया को सदैव अपने पास रखें या अपने धन स्थान में रखें। जब बच्चे के जन्म नक्षत्र आवे तो पुन: दाँत को शुद्ध करें और उसे धूप-दीप दिखायें ऐसा प्रत्येक माह करें। आपके पास धन की कोई कमी नहीं होगी।
यदि आप आर्थिक रूप से बहुत ही समस्याग्रस्त हैं तो २१ शुक्रवार “वैभव लक्ष्मी” का पूजन करें, व्रत करें और एक वर्ष से कम आयु की ५ कन्याओं को खीर एवं मिश्री प्रत्येक शुक्रवार को खिलायें। कुछ समय बाद ही आपकी परेशानी कम होने लगेगी।
यह एक ऐसा प्रयोग हैं जिससे आर्थिक सम्पन्नता स्थायी रूप से प्राप्त की जा सकती है। आप यह प्रयोग दीपावली की रात्रि को करें। इसे आप स्वयं भी कर सकते हैं या किसी योग्य ब्राह्मण से करवा सकते हैं।
दीपावली की रात्रि में एक मोती शंख या दक्षिणावर्ती शंख को दीपावली पूजन के साथ ही पूजें।
किसी भी लक्ष्मी मंत्र की पाँच माला या “श्री सूक्त” के सात पाठ करें।
शंख को पूजा स्थान पर ही रहने दें। अगले दिन प्रात:काल स्नान करके लाल आसन पर बैठकर अपने सामने शंख को रख कर उसी मंत्र का या “श्री सूक्त” का पाठ करें। प्रत्येक मंत्र के के बाद एक साबुत चावल का दाना शंख में डालें।
इस प्रकार आप १०८ बार मंत्र पाठ कर इतने ही चावल के दाने शंख में डालें। इस प्रकार प्रत्येक दिन पाठ करें।
यह आपको तब तक करना हैं जब तक कि शंख चावलों से न भर जाये। जिस दिन शंख भर जाये उस दिन शाम को एक सुहागिन, पाँच एक वर्ष से कम की कन्यायें और कम-से-कम एक ब्राह्मण को भोजन कराके और दक्षिणा देकर विदा करें तथा शंख को किसी लाल वस्त्र में बाँधकर अपने धन स्थान में रख दें।
जिस दिन यह प्रयोग समाप्त हो, उसके ४० दिन तक शंख को धूप अवश्य दिखायें।
इसके बाद शंख को पूजा स्थान या धन स्थान पर रखकर भूल जायें।
आपके इस प्रयोग से माँ लक्ष्मी का आपके यहाँ स्थायी वास हो जायेगा।
सावधानी यह रखें कि इस प्रयोग की चर्चा किसी से ना करें और जो चावल प्रयोग में लायें वो खण्डित ना हो।
ऐसा लगातार चार दिन तक करें।
आप पर माँ लक्ष्मी की अवश्य कृपा होगी।
शास्त्रानुसार प्रत्येक पूर्णिमा पर प्रात: १० बजे पीपल वृक्ष पर माँ लक्ष्मी का फेरा लगता है।
इसलिए जो व्यक्ति आर्थिक रूप से परेशान हो, वो इस समय पीपल के वृक्ष के पास जाये, उसका पूजन करें, जल चढ़ाये और लक्ष्मी जी की उपासना करे और कम-से-कम कोई भी एक लक्ष्मी मंत्र की एक माला करके आये।
दिल लगाने से पहले गुण अवश्य मिलायें
वर्तमान आधुनिक परिवेश खुला वातावरण एवं टी.वी. संस्कृति के कारण हमारी युवा पीढ़ी अपने लक्ष्यों से भटक रही है।
विना सोच-विचार किये गये प्रेम विवाह शीघ्र ही मन-मुटाव के चलते तलाक तक पहुँच जाते हैं।
टी.वी. धारावाहिकों एवं फिल्मो की देखादेखी युवक-युवती एक दूसरे को आकर्षित करने प्रयास करते हैं।
रोज डे, वेलेन्टाईन डे जैसे अवसर इन कार्यों को बढ़ावा देते हैं।
प्यार-मोहब्बत करें लेकिन सोच-समझकर।
अवसाद का शिकार होने आत्माहत्या से बचने या बदनामी से बचने हेतु दिल लगाने से पूर्व अपने साथी से अपने गुण-विचार ठीक प्रकार से मिला लें, ताकि भविष्य में पछताना न पड़े।
ग्रहों के कारण व्यक्ति प्रेम करता है और इन्हीं ग्रहों के प्रभाव से दिल भी टूटते हैं।
ज्योतिष शास्त्रों में प्रेम विवाह के योगों के बारे में स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता है, परन्तु जीवनसाथी के बारे में अपने से उच्च या निम्न का विस्तृत विवरण है।
कोई भी स्त्री-पुरूष अपने उच्च या निम्न कुल में तभी विवाह करेगा जब वे दोनों प्रेम करते होंगे।
आज की पढ़ी-लिखी और घोर भौतिकवादी युवा पीढ़ी अधिकतर प्रेम-विवाह की ओर आकर्षित हो रही है।
कई बार प्रेम एक-दूसरे की देखी या फ़ैशन के तौर पर भी होता है, किंतु जीवनपर्यंत निभ नहीं पाता।
ग्रह अनुकूल नहीं होन के कारण ऐसी स्थिति बनती है। शास्त्रों मे प्रेम विवाह को गांधर्व विवाह के नाम से जाना गया है।
किसी युवक-युवती के मध्य प्रेम की जो भावना पैदा होती है, वह सब उनके ग्रहों का प्रभाव ही होता है, जो कमाल दिखाता है।
ग्रह हमारी मनोदशा, पसंद-नापसंद और रूचियों को वय करते और बदलते है।
वर्तमान में प्रेम विवाह बहुत हद तक गंधर्व विवाह का ही परिवर्तित रूप है।
प्रेम विवाह के कुछ मुख्य योग :
* लेग्नेश का पंचक से संबंध हो और जन्मपत्रिका में पंचमेश-सप्तमेश का किसी भी रूप मे संबंध हो। शुक्र, मंगल की युति, शुक्र की राशि में स्थिति और लग्न त्रिकोण का संबंध प्रेम संबंधो का सूचक है। पंचम या सप्तक भाव में शुक्र सप्तमेश या पंचमेश के साथ हो।
* किसी की जन्मपत्रिका में लग्न, पंचम, सप्तम भाव व इनके स्वामियों और शुक्र तथा चन्द्रमा जातक के वैवाहिक जीवन व प्रेम संबंधों को समान रूप से प्रभावित करते हैं। लग्न या लग्नेश का सप्तम और सप्तमेश का पंचम भाव व पंचमेश से किसी भी रूप में संबंध प्रेम संबंध की सूचना देता है। यह संबंध सफल होगा अथवा नहीं, इसकी सूचना ग्रह योगों की शुभ-अशुभ स्थिति देती है।
*. यदि सप्तमेश लग्नेश से कमजोर हो अथवा यदि सप्तमेश अस्त हो अथवा मित्र राशि में हो या नवांश में नीच राशि हो तो जातक का विवाह अपने से निम्न कुल में होता है। इसमे विपरित लग्नेश से सप्तमेश बली हो, शुभ नवांश मे ही तो जीवनसाथी उच्च कुल का होता है।
*पंचमेश सप्तम भाव में हो अथवा लग्नेश और पंचमेश सप्तम भाव के स्वामी के साथ लग्न में स्थित हो। सप्तमेश पंचम भाव में हो और लग्न से संबंध बना रहा हो। पंचमेश सप्तम में हो और सप्तमेश पंचम में हो। सप्तमेश लग्न में और लग्नेश सप्तम में हो, साथ ही पंचम भाव के स्वामी से दृष्टि संबंध हो तो भी प्रेम संबंध का योग बनता है।
*. पंचम में मंगल भी प्रेम विवाह करवाता हैं। यदि राहु पंचम या सप्तम में हो तो प्रेम विवाह की संभावना होती हैं। सप्तम भाव में यदि मेष राशि में मंगल हो तो प्रेम विवाह होता हैं, सप्तमेश और पंचमेश एक-दूसरे के नक्षत्र पर हों तो भी प्रेम विवाह का योग बनता हैं।
* पंचमेश तथा सप्तमेश कहीं भी, किसी भी तरह से द्वादशेश से संबंध बनायें लग्नेश या सप्तमेश का आपस में स्थान परिवर्तन अथवा आपस में युक्त होना अथवा दृष्टि संबंधं।
* जैमिनी सूत्रानुसार दारा कारक और पुत्र कारक की युति भी प्रेम विवाह कराती है। पंचमेश और दाराकारक का संबंध भी प्रेम विाह करवाता है।
* सप्तमेश स्वगृही हो, एकादश स्थान पापग्रहों के प्रभाव में बिलकुल न हो, शुक्र लग्न में लग्नेश के साथ, मंगल सप्तक भाव में हो, सप्तमेश के साथ, चन्द्रमा लग्न में लग्नेश के साथ हो, तो भी प्रेम विवाह का योग बनता है।
प्रेम विवाह असफल रहने के कारण :
* शुक्र व मंगल की स्थिति व प्रभाव प्रेम संबंधों को प्रभावित करने की क्षमता रखते है। यदि किसी जातक की कुण्डली में सभी अनुकूल स्थितियाँ हों, शुक्र की स्थिति अनुकूल हो तो प्रेम संबंध टूटकर दिल टूटने की घटना होती है।
*. सप्तम भाव या सप्तमेश का पाप पीड़ित होना, पाप योग में होना प्रेम विवाह की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। पंचमेश व सप्तमेश देानों की स्थिति इस प्रकार हो कि उनका सपतम-पंचम से कोई संबंध न हो, तो प्रेम की असफलता दृष्टिगत होती है।
*. शुक्र का सूर्य के नक्षत्र में होना और उस पर चन्द्रमा का प्रभाव होने की स्थिति में प्रेम संबंध होने के उपरांत या परिस्थितिवश विवाह हो जाने पर भी सफलता नहीं मिलती। शुक्र का सूर्य-चन्द्रमा के मध्य में होना असफल प्रेम का कारण है।
*. पंचम व सप्तम भाव के स्वामी ग्रह यदि धीमी गति के ग्रह हों तो प्रेम संबंधों का योग होने पर चिर स्थाई प्रेम की अनुभूति दर्शाता है। इस प्रकार के जातक जीवन भर प्रेम प्रसंगों को नहीं भूलते चाहे वे सफल हों या असफल।
प्रेम विवाह को बल देने या मजबूत करने के उपाय :
* शुक्र देव की पूजा करें।
* पंचमेश व सप्तमेश की पूजा करें।
* पंचमेश का रत्न धारण करें।
* ब्ल्यू टोपाज सुखद दाम्पत्य एवं वशीकरण हेतु पहनें।
*. चन्द्रमणी प्रेम प्रसंग में सफलता प्रदान करती है।
प्रेम विवाह के लिये जन्मकुण्डली के पहले, पांचवें सप्तम भाव के साथ-साथ बारहवें भाव को भी देखें, क्योंकि विवाह के लिये बारहवाँ भाव भी देखा जाता हैं।
यह भाव शैया सुख का भी है।
इन भावों के साथ-साथ उन भावों के स्वामियों की स्थिति का पता करना होता है।
यदि इन भावों के स्वामियों का संबंध किसी भी रूप में अपने भावों से बन रहा हो, तो निश्चित रूप से जातक प्रेम विवाह करता है।
अन्तरजातीय विवाह के मामले में शनि की मुख्य भूमिका होती है।
यदि कुण्डली मे शनि का संबंध किसी भी रूप से प्रेम विवाह कराने वाले भावेशों के भाव से हो तो जातक अन्तरजातीय विवाह करेगा।
जीवनसाथी का संबंध सातवें भाव से होता है, जबकि पंचम भाव को सन्तान, उदन एवं बुद्धि का भाव माना गया है, लेकिन यह भाव प्रेम को भी दर्शाता है।
प्रेम विवाह के मामलों मे यह भाव विशेष भूमिका दर्शाता है।
कबीरदास जी, ने कहा है-
पोथी पढ-पढ जग मुआ पडित भयो ना कोई।
ढाई आखर प्रेम के, पढे सो पण्डित होई।।
प्रेम एक दिव्य, अलौकिक एवं वंदनीय तथा प्रफुल्लता देने वाली स्थिति है।
प्रेम मनुष्य में करूणा , दुलार और स्नेह की अनुभूति देता है।
फिर चाहे वह भक्त का भगवान से हो, माता का पुत्र से या प्रेमी का प्रेमिका के लिये हो, सभी का अपना महत्व है।
प्रेम और विवाह, विवाह और प्रेम दोनों के समान अर्थ हैं, लेकिन दोनों के क्रम में परिवर्तन है।
विवाह पश्चात पति या पत्नी के बीच समर्पण व भावनात्मकता प्रेम का एक पहलू है।
प्रेम संबंध का विवाह में रूपांतरित होना इस बात को दर्शाता है कि प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे से भावनात्मक रूप से इतना जुड़े हुये हैं कि वे जीवन भर साथ रहना चाहते हैं।
सर्वविदित है कि हिन्दू संस्कृति में जिन सोलह संस्कारों का वर्णन किया है, उनमें से विवाह एक महत्वपूर्ण संस्कार है।
जीवन के विकास, उसमें सरलता और सृष्टि को नये आयाम देने के लिये विवाह परम आवश्यक प्रक्रिया है, इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है।
प्रेम और विवाह आदर्श स्थितियों में वन्दनीय, आनन्ददायक और प्रफुल्लता देन वाला है।
प्रेम संबंध का परिणाम विवाह होगा या नहीं - इस प्रकर की स्थिति में ज्योतिष का आश्रय लेकर काफी हद तक भविष्य के संभावित परिणामों के बारे में जाना जा सकता है।
दिल लगाने से पूर्व या टूटने की स्थिति न आये, इस हेतु प्रेमी-प्रेमिका को अपनी जन्मपत्रिका के ग्रहों की स्थिति किसी योग्य ज्योतिषी से अवश्य पूछ लेनी चाहिये कि उनके जीवन में प्रेम की घटना होगी या नहीं। प्रेम ईश्वर का वरदान है। प्रेम करें अवश्य लेकिन सोच समझकर।
sanklan
वर्तमान आधुनिक परिवेश खुला वातावरण एवं टी.वी. संस्कृति के कारण हमारी युवा पीढ़ी अपने लक्ष्यों से भटक रही है।
विना सोच-विचार किये गये प्रेम विवाह शीघ्र ही मन-मुटाव के चलते तलाक तक पहुँच जाते हैं।
टी.वी. धारावाहिकों एवं फिल्मो की देखादेखी युवक-युवती एक दूसरे को आकर्षित करने प्रयास करते हैं।
रोज डे, वेलेन्टाईन डे जैसे अवसर इन कार्यों को बढ़ावा देते हैं।
प्यार-मोहब्बत करें लेकिन सोच-समझकर।
अवसाद का शिकार होने आत्माहत्या से बचने या बदनामी से बचने हेतु दिल लगाने से पूर्व अपने साथी से अपने गुण-विचार ठीक प्रकार से मिला लें, ताकि भविष्य में पछताना न पड़े।
ग्रहों के कारण व्यक्ति प्रेम करता है और इन्हीं ग्रहों के प्रभाव से दिल भी टूटते हैं।
ज्योतिष शास्त्रों में प्रेम विवाह के योगों के बारे में स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता है, परन्तु जीवनसाथी के बारे में अपने से उच्च या निम्न का विस्तृत विवरण है।
कोई भी स्त्री-पुरूष अपने उच्च या निम्न कुल में तभी विवाह करेगा जब वे दोनों प्रेम करते होंगे।
आज की पढ़ी-लिखी और घोर भौतिकवादी युवा पीढ़ी अधिकतर प्रेम-विवाह की ओर आकर्षित हो रही है।
कई बार प्रेम एक-दूसरे की देखी या फ़ैशन के तौर पर भी होता है, किंतु जीवनपर्यंत निभ नहीं पाता।
ग्रह अनुकूल नहीं होन के कारण ऐसी स्थिति बनती है। शास्त्रों मे प्रेम विवाह को गांधर्व विवाह के नाम से जाना गया है।
किसी युवक-युवती के मध्य प्रेम की जो भावना पैदा होती है, वह सब उनके ग्रहों का प्रभाव ही होता है, जो कमाल दिखाता है।
ग्रह हमारी मनोदशा, पसंद-नापसंद और रूचियों को वय करते और बदलते है।
वर्तमान में प्रेम विवाह बहुत हद तक गंधर्व विवाह का ही परिवर्तित रूप है।
प्रेम विवाह के कुछ मुख्य योग :
* लेग्नेश का पंचक से संबंध हो और जन्मपत्रिका में पंचमेश-सप्तमेश का किसी भी रूप मे संबंध हो। शुक्र, मंगल की युति, शुक्र की राशि में स्थिति और लग्न त्रिकोण का संबंध प्रेम संबंधो का सूचक है। पंचम या सप्तक भाव में शुक्र सप्तमेश या पंचमेश के साथ हो।
* किसी की जन्मपत्रिका में लग्न, पंचम, सप्तम भाव व इनके स्वामियों और शुक्र तथा चन्द्रमा जातक के वैवाहिक जीवन व प्रेम संबंधों को समान रूप से प्रभावित करते हैं। लग्न या लग्नेश का सप्तम और सप्तमेश का पंचम भाव व पंचमेश से किसी भी रूप में संबंध प्रेम संबंध की सूचना देता है। यह संबंध सफल होगा अथवा नहीं, इसकी सूचना ग्रह योगों की शुभ-अशुभ स्थिति देती है।
*. यदि सप्तमेश लग्नेश से कमजोर हो अथवा यदि सप्तमेश अस्त हो अथवा मित्र राशि में हो या नवांश में नीच राशि हो तो जातक का विवाह अपने से निम्न कुल में होता है। इसमे विपरित लग्नेश से सप्तमेश बली हो, शुभ नवांश मे ही तो जीवनसाथी उच्च कुल का होता है।
*पंचमेश सप्तम भाव में हो अथवा लग्नेश और पंचमेश सप्तम भाव के स्वामी के साथ लग्न में स्थित हो। सप्तमेश पंचम भाव में हो और लग्न से संबंध बना रहा हो। पंचमेश सप्तम में हो और सप्तमेश पंचम में हो। सप्तमेश लग्न में और लग्नेश सप्तम में हो, साथ ही पंचम भाव के स्वामी से दृष्टि संबंध हो तो भी प्रेम संबंध का योग बनता है।
*. पंचम में मंगल भी प्रेम विवाह करवाता हैं। यदि राहु पंचम या सप्तम में हो तो प्रेम विवाह की संभावना होती हैं। सप्तम भाव में यदि मेष राशि में मंगल हो तो प्रेम विवाह होता हैं, सप्तमेश और पंचमेश एक-दूसरे के नक्षत्र पर हों तो भी प्रेम विवाह का योग बनता हैं।
* पंचमेश तथा सप्तमेश कहीं भी, किसी भी तरह से द्वादशेश से संबंध बनायें लग्नेश या सप्तमेश का आपस में स्थान परिवर्तन अथवा आपस में युक्त होना अथवा दृष्टि संबंधं।
* जैमिनी सूत्रानुसार दारा कारक और पुत्र कारक की युति भी प्रेम विवाह कराती है। पंचमेश और दाराकारक का संबंध भी प्रेम विाह करवाता है।
* सप्तमेश स्वगृही हो, एकादश स्थान पापग्रहों के प्रभाव में बिलकुल न हो, शुक्र लग्न में लग्नेश के साथ, मंगल सप्तक भाव में हो, सप्तमेश के साथ, चन्द्रमा लग्न में लग्नेश के साथ हो, तो भी प्रेम विवाह का योग बनता है।
प्रेम विवाह असफल रहने के कारण :
* शुक्र व मंगल की स्थिति व प्रभाव प्रेम संबंधों को प्रभावित करने की क्षमता रखते है। यदि किसी जातक की कुण्डली में सभी अनुकूल स्थितियाँ हों, शुक्र की स्थिति अनुकूल हो तो प्रेम संबंध टूटकर दिल टूटने की घटना होती है।
*. सप्तम भाव या सप्तमेश का पाप पीड़ित होना, पाप योग में होना प्रेम विवाह की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। पंचमेश व सप्तमेश देानों की स्थिति इस प्रकार हो कि उनका सपतम-पंचम से कोई संबंध न हो, तो प्रेम की असफलता दृष्टिगत होती है।
*. शुक्र का सूर्य के नक्षत्र में होना और उस पर चन्द्रमा का प्रभाव होने की स्थिति में प्रेम संबंध होने के उपरांत या परिस्थितिवश विवाह हो जाने पर भी सफलता नहीं मिलती। शुक्र का सूर्य-चन्द्रमा के मध्य में होना असफल प्रेम का कारण है।
*. पंचम व सप्तम भाव के स्वामी ग्रह यदि धीमी गति के ग्रह हों तो प्रेम संबंधों का योग होने पर चिर स्थाई प्रेम की अनुभूति दर्शाता है। इस प्रकार के जातक जीवन भर प्रेम प्रसंगों को नहीं भूलते चाहे वे सफल हों या असफल।
प्रेम विवाह को बल देने या मजबूत करने के उपाय :
* शुक्र देव की पूजा करें।
* पंचमेश व सप्तमेश की पूजा करें।
* पंचमेश का रत्न धारण करें।
* ब्ल्यू टोपाज सुखद दाम्पत्य एवं वशीकरण हेतु पहनें।
*. चन्द्रमणी प्रेम प्रसंग में सफलता प्रदान करती है।
प्रेम विवाह के लिये जन्मकुण्डली के पहले, पांचवें सप्तम भाव के साथ-साथ बारहवें भाव को भी देखें, क्योंकि विवाह के लिये बारहवाँ भाव भी देखा जाता हैं।
यह भाव शैया सुख का भी है।
इन भावों के साथ-साथ उन भावों के स्वामियों की स्थिति का पता करना होता है।
यदि इन भावों के स्वामियों का संबंध किसी भी रूप में अपने भावों से बन रहा हो, तो निश्चित रूप से जातक प्रेम विवाह करता है।
अन्तरजातीय विवाह के मामले में शनि की मुख्य भूमिका होती है।
यदि कुण्डली मे शनि का संबंध किसी भी रूप से प्रेम विवाह कराने वाले भावेशों के भाव से हो तो जातक अन्तरजातीय विवाह करेगा।
जीवनसाथी का संबंध सातवें भाव से होता है, जबकि पंचम भाव को सन्तान, उदन एवं बुद्धि का भाव माना गया है, लेकिन यह भाव प्रेम को भी दर्शाता है।
प्रेम विवाह के मामलों मे यह भाव विशेष भूमिका दर्शाता है।
कबीरदास जी, ने कहा है-
पोथी पढ-पढ जग मुआ पडित भयो ना कोई।
ढाई आखर प्रेम के, पढे सो पण्डित होई।।
प्रेम एक दिव्य, अलौकिक एवं वंदनीय तथा प्रफुल्लता देने वाली स्थिति है।
प्रेम मनुष्य में करूणा , दुलार और स्नेह की अनुभूति देता है।
फिर चाहे वह भक्त का भगवान से हो, माता का पुत्र से या प्रेमी का प्रेमिका के लिये हो, सभी का अपना महत्व है।
प्रेम और विवाह, विवाह और प्रेम दोनों के समान अर्थ हैं, लेकिन दोनों के क्रम में परिवर्तन है।
विवाह पश्चात पति या पत्नी के बीच समर्पण व भावनात्मकता प्रेम का एक पहलू है।
प्रेम संबंध का विवाह में रूपांतरित होना इस बात को दर्शाता है कि प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे से भावनात्मक रूप से इतना जुड़े हुये हैं कि वे जीवन भर साथ रहना चाहते हैं।
सर्वविदित है कि हिन्दू संस्कृति में जिन सोलह संस्कारों का वर्णन किया है, उनमें से विवाह एक महत्वपूर्ण संस्कार है।
जीवन के विकास, उसमें सरलता और सृष्टि को नये आयाम देने के लिये विवाह परम आवश्यक प्रक्रिया है, इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है।
प्रेम और विवाह आदर्श स्थितियों में वन्दनीय, आनन्ददायक और प्रफुल्लता देन वाला है।
प्रेम संबंध का परिणाम विवाह होगा या नहीं - इस प्रकर की स्थिति में ज्योतिष का आश्रय लेकर काफी हद तक भविष्य के संभावित परिणामों के बारे में जाना जा सकता है।
दिल लगाने से पूर्व या टूटने की स्थिति न आये, इस हेतु प्रेमी-प्रेमिका को अपनी जन्मपत्रिका के ग्रहों की स्थिति किसी योग्य ज्योतिषी से अवश्य पूछ लेनी चाहिये कि उनके जीवन में प्रेम की घटना होगी या नहीं। प्रेम ईश्वर का वरदान है। प्रेम करें अवश्य लेकिन सोच समझकर।
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विवाह में देरी के कारण और उपाय
ज्योतिष चर्चा : विवाह में देरी के कारण और उपाय
मुख्यतः सातवाँ भाव विवाह, पत्नी या पति और वैवाहिक सुख को दर्शाता है।
यदि सातवाँ भाव मंगल के प्रभाव में हो (दृष्टि या स्थिति द्वारा), तो यह मंगल दोष की स्थिति पैदा करता है।
जब मंगल लग्न से पहले, दूसरे, चौथे, आठवें या बारहवें घर में हो, तो जातक मांगलिक कहलाता है।
हालाँकि कुछ ज्योतिषी इस स्थिति को चन्द्रमा या चन्द्र-लग्न और शुक्र के आधार मानते हैं।
न सिर्फ़ मंगल की नकारात्मक स्थिति सातवें भाव को ख़राब करती है, बल्कि कई दूसरी चीज़ें जैसे कि शनि, राहु-केतु और सूर्य आदि अन्य ग्रहों की स्थिति भी इसपर ख़ासा प्रभाव डालती हैं।
सातवें भाव के स्वामी की स्थिति का भी शादीशुदा ज़िन्दगी पर बहुत असर होता है।
अगर सातवें भाव का स्वामी दुःस्थान में है अर्थात ६, ८ या १२ में बैठा है, तो वैवाहिक जीवन पर इसका बुरा असर होता है।
पुरुषों के लिए सातवें भाव का कारक शुक्र है और स्त्रियों के लिए गुरू। अगर किसी भाव का कारक ख़ुद उसी भाव में बैठा हो तो वह उस भाव के प्रभावों को नष्ट कर देता है।
कुछ ऐसे सामान्य योग जो विवाह में विलम्ब करते हैं, निम्नांकित हैं -
१. यदि शनि लग्न या चन्द्रमा से पहले, तीसरे, पाँचवें, सातवें, दसवें स्थान पर हो और वह किसी शुभ भाव में न हो।
२. सातवें भाव में शनि आदि किसी अशुभ ग्रह या वहाँ मंगल का अपनी ही राशि में होना शादी में देरी की वजह बनते हैं।
३. अगर मंगल और शुक्र पाँचवें, सातवें या नौवें घर में साथ बैठे हों और उनपर गुरू की अशुभ दृष्टि हो।
४. यदि सातवें भाव के स्वामी और बृहस्पति को शनि देख रहा हो।
५. सातवें भाव के किसी भी ओर अशुभ ग्रहों का होना भी विवाह में देरी का कारण बनता है। ऐसे में सातवाँ घर पापकर्तरी योग के अन्तर्गत आ जाता है।
६. अगर लग्न, सूर्य और चन्द्रमा पर अशुभ दृष्टियाँ हों।
७. जब सातवें भाव का स्वामी सातवें भाव से छठे, दूसरे या बारहवें घर में स्थित हो, तो लड़की की शादी में विलम्ब होता है। यह विवाह में देरी का प्रबल योग है और अशुभ ग्रहों के सातवें भाव के स्वामी के साथ बैठने या स्वयं सातवें भाव में बैठने से और भी शक्तिशाली हो जाता है।
८. राहु और शुक्र लग्न में हों या सातवें भाव में हों अथवा मंगल और सूर्य अन्य नकारात्मक कारकों के साथ सातवें भाव में हों, तो विवाह में देरी तय है।
९. जब सूर्य, चन्द्र और पाँचवें भाव का स्वामी शनि के साथ युति कर रहे हों या उनपर शनि की दृष्टि हो।
१०. यदि सातवें का स्वामी, लग्न और शुक्र मिथुन, सिंह, कन्या या धनु राशि में हो।
११. शुक्र और चन्द्रमा की युति पर मंगल और शनि की दृष्टि हो और सातवाँ भाव गुरू द्वारा न देखा जा रहा हो या पहले, सातवें और बारहवें भाव में अशुभ ग्रह स्थित हों।
१२. शनि दूसरे, राहु नौवें, सातवें का स्वामी और अशुभ ग्रह तीसरे भाव में हों।
विवाह में विलम्ब को दूर करने के उपाय
क) वे लड़कियाँ जिनकी शादी में देरी हो रही हो, उन्हें ‘गौरी पूजा’ करनी चाहिए और माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सामने ज़्यादा-से-ज़्यादा बार स्तोत्र-पाठ करना चाहिए।
ख) अगर सातवें भाव पर नकारात्मक असर डालने वाले किसी ग्रह विशेष की दशा चल रही हो, तो उस ग्रह के अधिष्ठाता देवता की उपासना करनी चाहिए।
ग) जिन कन्याओं का विवाह मांगलिक दोष के चलते टल रहा हो, उन्हें शीघ्र विवाह के लिए देवी की आराधना करनी चाहिए।
घ) वे लड़के जिनकी शादी नहीं हो पा रही है, उन्हें माँ लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि वे शुक्र की अधिष्ठात्री देवी हैं और शुक्र विवाह का कारक है।
sanklan>>>>>>>>>>>>>>>
vaastu acharya
0 9013289566
0 9013203040
मुख्यतः सातवाँ भाव विवाह, पत्नी या पति और वैवाहिक सुख को दर्शाता है।
यदि सातवाँ भाव मंगल के प्रभाव में हो (दृष्टि या स्थिति द्वारा), तो यह मंगल दोष की स्थिति पैदा करता है।
जब मंगल लग्न से पहले, दूसरे, चौथे, आठवें या बारहवें घर में हो, तो जातक मांगलिक कहलाता है।
हालाँकि कुछ ज्योतिषी इस स्थिति को चन्द्रमा या चन्द्र-लग्न और शुक्र के आधार मानते हैं।
न सिर्फ़ मंगल की नकारात्मक स्थिति सातवें भाव को ख़राब करती है, बल्कि कई दूसरी चीज़ें जैसे कि शनि, राहु-केतु और सूर्य आदि अन्य ग्रहों की स्थिति भी इसपर ख़ासा प्रभाव डालती हैं।
सातवें भाव के स्वामी की स्थिति का भी शादीशुदा ज़िन्दगी पर बहुत असर होता है।
अगर सातवें भाव का स्वामी दुःस्थान में है अर्थात ६, ८ या १२ में बैठा है, तो वैवाहिक जीवन पर इसका बुरा असर होता है।
पुरुषों के लिए सातवें भाव का कारक शुक्र है और स्त्रियों के लिए गुरू। अगर किसी भाव का कारक ख़ुद उसी भाव में बैठा हो तो वह उस भाव के प्रभावों को नष्ट कर देता है।
कुछ ऐसे सामान्य योग जो विवाह में विलम्ब करते हैं, निम्नांकित हैं -
१. यदि शनि लग्न या चन्द्रमा से पहले, तीसरे, पाँचवें, सातवें, दसवें स्थान पर हो और वह किसी शुभ भाव में न हो।
२. सातवें भाव में शनि आदि किसी अशुभ ग्रह या वहाँ मंगल का अपनी ही राशि में होना शादी में देरी की वजह बनते हैं।
३. अगर मंगल और शुक्र पाँचवें, सातवें या नौवें घर में साथ बैठे हों और उनपर गुरू की अशुभ दृष्टि हो।
४. यदि सातवें भाव के स्वामी और बृहस्पति को शनि देख रहा हो।
५. सातवें भाव के किसी भी ओर अशुभ ग्रहों का होना भी विवाह में देरी का कारण बनता है। ऐसे में सातवाँ घर पापकर्तरी योग के अन्तर्गत आ जाता है।
६. अगर लग्न, सूर्य और चन्द्रमा पर अशुभ दृष्टियाँ हों।
७. जब सातवें भाव का स्वामी सातवें भाव से छठे, दूसरे या बारहवें घर में स्थित हो, तो लड़की की शादी में विलम्ब होता है। यह विवाह में देरी का प्रबल योग है और अशुभ ग्रहों के सातवें भाव के स्वामी के साथ बैठने या स्वयं सातवें भाव में बैठने से और भी शक्तिशाली हो जाता है।
८. राहु और शुक्र लग्न में हों या सातवें भाव में हों अथवा मंगल और सूर्य अन्य नकारात्मक कारकों के साथ सातवें भाव में हों, तो विवाह में देरी तय है।
९. जब सूर्य, चन्द्र और पाँचवें भाव का स्वामी शनि के साथ युति कर रहे हों या उनपर शनि की दृष्टि हो।
१०. यदि सातवें का स्वामी, लग्न और शुक्र मिथुन, सिंह, कन्या या धनु राशि में हो।
११. शुक्र और चन्द्रमा की युति पर मंगल और शनि की दृष्टि हो और सातवाँ भाव गुरू द्वारा न देखा जा रहा हो या पहले, सातवें और बारहवें भाव में अशुभ ग्रह स्थित हों।
१२. शनि दूसरे, राहु नौवें, सातवें का स्वामी और अशुभ ग्रह तीसरे भाव में हों।
विवाह में विलम्ब को दूर करने के उपाय
क) वे लड़कियाँ जिनकी शादी में देरी हो रही हो, उन्हें ‘गौरी पूजा’ करनी चाहिए और माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सामने ज़्यादा-से-ज़्यादा बार स्तोत्र-पाठ करना चाहिए।
ख) अगर सातवें भाव पर नकारात्मक असर डालने वाले किसी ग्रह विशेष की दशा चल रही हो, तो उस ग्रह के अधिष्ठाता देवता की उपासना करनी चाहिए।
ग) जिन कन्याओं का विवाह मांगलिक दोष के चलते टल रहा हो, उन्हें शीघ्र विवाह के लिए देवी की आराधना करनी चाहिए।
घ) वे लड़के जिनकी शादी नहीं हो पा रही है, उन्हें माँ लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि वे शुक्र की अधिष्ठात्री देवी हैं और शुक्र विवाह का कारक है।
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